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बेहद खर्चीला है शहरों के नाम बदलने का शौक

-देश भर में नगरों, स्थलों के नाम बदलने का प्रचलन तेजी से बढ़ा, करोड़ों रूपये खर्च करने पड़ते हैं सरकारों को
पंकज कुशवाल, PEN POINT।  साल 2006, दिसंबर महीने में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी थी। राज्य बने 6 साल हो चुके थे लेकिन अलग राज्य उत्तरांचल के नाम से मिला था तो राज्य गठन के बाद से ही बड़ा तबका राज्य का नाम मूल भावनाओं के आधार पर उत्तराखंड करने की मांग कर रहा था। चुनावी रण में उतरने से पहले तिवारी सरकार ने बड़ा एलान कर उत्तरांचल का नाम उत्तराखंड करने की घोषणा कर दी। राज्य सरकार की ओर से भेजे गए विधेयक पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही उत्तरांचल का नाम उत्तराखंड कर दिया गया। नाम परिर्वतन की यह प्रक्रिया राज्य के खाते पर भारी पड़ा। बोर्ड, विभागों के पते समेत तमाम जगहों से उत्तरांचल हटाकर उत्तराखंड करने पर 2007 में करीब 400 करोड़ रूपये खर्च हुए। हालांकि, नाम परिर्वतन का फायदा तिवारी सरकार को नहीं मिल सका और उसके अगले महीने 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता ने तिवारी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हरा दिया और सत्ता भाजपा को सौंप दी।
उत्तराखंड में नाम परिर्वतन का यह पहला और आखिरी मौका था। लेकिन, देश भर में आजादी के बाद से शहरों, राज्यों, स्थलों के नाम बदलने की परंपरा रही है। 2017 में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद नाम बदलने का यह प्रचलन तेजी से बढ़ा है।
देश के अलग अलग राज्यों में वोट बैंक साधने, सामाजिक धु्रवीकरण को बढ़ावा देने, राजनीतिक एजेंडा सेट करने के साथ ही कई बार जनभावनाओं के मद्देनजर नाम बदलने का रिवाज रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक शहर के नाम बदलने की प्रक्रिया में ही साइन बोर्ड, कार्यालयों के बोर्ड में नाम बदलने का खर्च ही 300 करोड़ रूपये तक खर्च हो जाते हैं।

आईए जानते हैं कि भारत में उन प्रमुख शहरों के नाम जिनके नाम बदले गये हैं –

इलाहाबाद
मुगल शासक सम्राट अकबर ने इलाहाबाद शहर का नाम इलाहब रखा था, हालांकि समय के साथ इस शहर को इलाहाबाद के नाम से जाना जाने लगा। उसके बाद कुछ समय के लिए इसका नाम प्रयाग रखा गया। हालांकि बाद में इसे फिर से बदलकर इलाहाबाद कर दिया गया था. लेकिन योगी सरकार ने एक बार फिर इलाहाबाद को बदलकर इसका नाम प्रयागराज रख दिया।
कानपुर
आपको बता दें कि कानपुर शहर का नाम अब तक 21 बार बदल चुका है। इतिहासकारों के अनुसार कानपुर का पहला नाम ‘कान्हपुर’ था, जिसकी स्थापना हिंदू राजा चंदेल सिंह ने की थी। इसके अलावा कानपुर का नाम खानपुर भी रखा गया था। आखिर में, आजादी के बाद साल 1948 में इस शहर का नाम कानपुर पड़ा, तब से लेकर आज तक लोग इस शहर को कानपुर के नाम से ही जानते हैं।

तिरुवनंतपुरम
केरल राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम का नाम भी समय के साथ कई बार बदला जा चुका है. अंग्रेजी में इस शहर को त्रिवेंद्रम के नाम से जाना जाता था. साल 1991 में, केरल सरकार ने शहर का नाम बदलकर तिरुवनंतपुरम करने का फैसला किया।

मुंबई
सालों पहले मुंबई को मुंबा देवी के नाम से जाना जाता था. मुंबई में जो आखिरी का आई है, उसका मतलब होता है मां यानी मुंबई का मतलब हुआ ‘मुंबा मां’, लेकिन औरंगजेब के शासन काल में इस शहर को बॉम्बे कहा जाने लगा. हालांकि, साल 1995 में इस शहर का नाम मुंबई रख दिया गया।

पणजी
गोवा की राजधानी पणजी का नाम भी समय-समय पर कई बार बदला जा चुका है। पणजी शब्द का अर्थ है ‘वह भूमि जहां कभी बाढ़ नहीं आती’। आपको बता दें कि शुरू में पुर्तगालियों ने इस शहर का नाम पंजिम रखा था। कुछ साल बाद, शहर का नाम ‘नोवा गोवा’ रखा गया, जिसका अर्थ है न्यू गोवा. लेकिन साल 1961 में इस शहर का नाम बदलकर पणजी कर दिया गया।

चेन्नई
मद्रास का नाम साल 1996 में बदला गया था. अंग्रेजों ने मद्रास का नाम मद्रासपट्टिनम से बदलकर मद्रास रखा था। आज भी चेन्नई में इस नाम का मछुआरों का एक कस्बा है। कुछ लोगों का कहना है कि इस शहर का नाम तेलुगु राजा दमारला चेनप्पा नायकुडु के नाम पर रखा गया है जबकि एक मत यह भी है कि यह नाम चेन्ना केसवा पेरुमत मंदिर से आया है. हालांकि अब मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई कर दिया गया है।

कोलकाता
भारत के सांस्कृतिक शहरों में से एक कलकत्ता ने साल 2001 में फिर से अपना बंगाली नाम कोलकाता अपना लिया था। यह कोलिकाता का छोटा रूप है। यह यहां स्थापित एक ऐसा गांव था, जो ब्रिटिशों के इस पर कब्जे से पहले यहां हुआ करता था. इसके अलावा कलकत्ता जिन दो गांवों को मिलाकर बना है। उनके नाम थे सुतानुती और गोविंदपुर. अब कलकत्ता को कोलकाता के नाम से जाना जाता

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