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International Labor Day : सदी भर के संघर्ष के बाद मिल सका 8 घंटे काम का अधिकार

– भारत में सौ साल का हुआ ‘मजदूर दिवस’
– काम के घंटों में कटौती व बुनियादी अधिकारों को लेकर 1886 में मजदूरों ने शिकागो किया था प्रदर्शन, गोलीबारी में सैकड़ों मजदूरों को गंवानी पड़ी थी अपनी जान

PEN POINT, DEHRADUN :आज दुनियाभर में ‘इंटरनेशनल लेबर डे’ यानि अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जा रहा है। मजदूरों के अधिकारों, सुरक्षा को समर्पित मजदूर दिवस को भारत में मनाने का यह 100वां साल भी है। करीब 134 साल पहले 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाने का इस फैसले के पीछे अपने अधिकारों और काम के घंटों में कटौती को लेकर प्रदर्शन कर रहे मजदूरों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। करीब एक सदी से अधिक समय तक चले लंबे संघर्ष के बाद मजदूरों को यह राहत मिल सकी थी कि उनसे सिर्फ 8 घंटे ही काम लिया जाए जबकि इससे पहले तक 18-18 घंटे तक मजदूर मामूली मजदूरी पर खटते रहते थे।
औद्योगिक क्रांति शुरू होने के बाद अधिक उत्पादन को लेकर उद्योगपति बेरहमी की हद पार कर चुके थे। मशीनीकरण के बाद का दौर पूंजी के केंद्रीकरण का था। उसमें आदमी को भी मशीन मान लिया गया था। फैक्ट्रियों में काम के घंटे निर्धारित नहीं थे। 19वीं शताब्दी के आरंभ तक ‘कार्यदिवस’ का अर्थ था, सूरज निकलने से सूरज छिपने तक काम करना। मौसम के अनुसार दिन घटता बढ़ता तो काम के घंटे भी। हर कामगार को प्रतिदिन 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता था। मौसम के अनुसार काम के घंटे भी बढ़कर 18 घंटे तक भी पहुंच जाते। कामगार महिला हो, बच्चा हो, बुजुर्ग हो या पुरूष, काम के घंटों को लेकर कोई रियायत नहीं थी। मजदूरी बहुत कम थी। 16 से 18 घंटों तक काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे वे सामान्य जीवन भी जी सकें। ऊपर से बार-बार आने वाली मंदी के कारण मजदूरों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ता था। मजदूर यदा कदा इन काम के घंटों को कम करने की मांग करते रहते। 1827 में पहली बार मजदूरों ने काम के घंटों को 10 घंटे प्रतिदिन करने की पहली बार मांग उठाई। हालांकि उससे पहले 1791 में फिलाडेफिया के बढ़इयों ने 10 घंटे के कार्यदिवस के लिए हड़ताल की थी। उसके बाद 1827 में ‘मेकेनिक्स यूनियन ऑफ़ फिलाडेफिया’, जिसे विश्व का पहला मजदूर संगठन कहा जा सकता है, के नेतृत्व में निर्माण कार्य के मजदूरों ने, 10 घंटों के कार्यदिवस की मांग को लेकर हड़ताल की थी। 1830-40 के बीच उनकी मांग में और भी तेजी आ गई। उसके फलस्वरूप 1860 तक लगभग सभी देशों ने कार्यदिवस के औसत घंटों को 12 से घटाकर, 11 कर दिया था। मजदूर कार्यदिवस को 10 घंटों तक सीमित करने की मांग पर अड़े थे। लेकिन, इस बीच अमेरिका में सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के काम के घंटों में कटौती करने का फैसला लिया लेकिन मजदूरों पर कोई फैसला नहीं लिया गया। यह मांग चल रही थी कि तभी मजदूरों के एक बड़े वर्ग ने काम के घंटों को 8 घंटे तक सीमित करने की मांग उठानी शुरू कर दी।
इस बार वह मांग सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं थी। बल्कि जहां-जहां भी श्रमिक उत्पीड़न का शिकार थे, वहांदृवहां वे अपनी मांग के समर्थन में सरकार और उद्योगों पर दबाव बनाने में लगे थे। 1856 में आस्ट्रेलिया के निर्माण मजदूरों ने, 8 घंटे की मांग को लेकर नारा गढ़ा था कि 8 घंटे काम, 8 घंटे मनोरंजन और 8 घंटे आराम। इस मांग को तब बल मिला जब अगस्त 1866 में ‘नेशनल लेबर यूनियन’ ने 8 घंटे की मांग का समर्थन किया। वह अमेरिका का पहला मजदूर संगठन था। अपने स्थापना समारोह में ही 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए संगठन की ओर कहा गया था कि पूंजीवादी दासता से श्रमिकों की मुक्ति हेतु वर्तमान समय की सबसे पहली और बड़ी जरूरत है, अमेरिका के सभी राज्यों में 8 घंटे के कार्यदिवस को वैध माना जाए। साल 1886 में आखिरकार शिकागो शहर में मजदूर काम के घंटों को 8 घंटे प्रति कार्यदिवस करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए। सरकार को मजदूरों का यूं सड़क पर उतरना रास न आया। प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर पुलिसिया कहर बरपाया गया। सैकड़ों मजदूर गोलियों के शिकार हुए।
इस घटना के तीन साल बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई। इस बैठक में तय किया गया कि हर मजदूर से प्रतिदिन 8 घंटे ही काम लिया जाएगा। वहीं सम्मेलन के बाद 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला लिया गया। इस दिन हर साल मजदूरों को छुट्टी देने का भी फैसला लिया गया। बाद में अमेरिका के मजदूरों की तरह अन्य कई देशों में भी 8 घंटे काम करने के नियम को लागू कर दिया गया।

भारत में मजदूर दिवस
अमेरिका में मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव 1 मई 1889 को लागू हुआ लेकिन भारत में इस दिन को मनाने की शुरुआत लगभग 34 साल बाद हुई। भारत में भी मजदूर अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मजदूरों का नेतृत्व वामपंथी कर रहे थे। उनके आंदोलन को देखते हुए 1 मई 1923 में पहली बार चेन्नई में मजदूर दिवस मनाया गया। लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान की अध्यक्षता में मजदूर दिवस मनाने की घोषणा की गई। कई संगठन और सोशल पार्टी ने इस फैसले का समर्थन किया।

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