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जनसंघ : भाजपा की नींव, जिसे पहले चुनाव में मिली थी महज तीन सीटें

1951 में आज ही के दिन दिल्‍ली में हुई थी जनसंघ की स्‍थापना, पहले संसदीय चुनाव में मिली थी तीन सीटें

Pen Point, Dehradun : भारतीय जनता पार्टी आज केंद्र के साथ ही दर्जनों राज्‍यों की सत्‍ता पर काबिज है।  नई दिल्‍ली में दीन दयाल उपाध्‍याय मार्ग स्थित भाजपा मुख्‍यालय इस पार्टी का केंद्र बिंदु है। दरअसल, 72 साल पहले इसी जगह जनसंघ की स्‍थापना हुई थी। कहा जा सकता है कि भाजपा जनसंघ का ही नया अवतार है। 21 अक्‍टूबर 1951 को जनसंघ अस्तित्‍व में आया था। इसके लिये देश भर से कांग्रेस की विरोधी विचार धारा वाले 200 प्रतिनिधि दिल्‍ली में जुटे थे। श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी, प्रोफेसर बलराज मधोक और दीनदयाल उपाध्‍याय जनसंघ के प्रमुख संस्‍थापक सदस्‍य थे।

जनसंघ के गठन के साथ ही 1952 का संसदीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया गया। इस चुनाव में पार्टी को दीपक चुनाव चिन्‍ह मिला था और इसके 94 उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में उतारे गए। लेकिन जनसंघ को तीन सीटें ही मिल सकी। जीते हुए तीन उम्‍मीदवारों में से एक स्‍वयं श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे।

इसके बाद 1957 के आम चुनावों में जनसंघ की सीटों में खास इजाफा नहीं हुआ। इसे चार सीटों के साथ ही संतोष करना पड़ा। जबकि इसने 494 में से 130 संसदीय सीटों पर प्रत्‍याशी उतारे थे। इस चुनाव में यूपी की बलरामपुर सीट से युवा अटल बिहारी वाजपेयी ने भी जीत हासिल की थी। इतना जरूर था कि जनसंघ ने स्‍थापना के एक वर्ष के भीतर ही राष्‍ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया था। अब इसे अखिल भारतीय जनसंघ कहा जाने लगा।

1962 के आम चुनाव में अखिल भारतीय जनसंघ ने 14 सीटें हासिल कर ली। जिससे उसका वोट शेयर पहले चुनाव के मुकाबले बढ़कर दोगुने से ज्‍यादा हो गया। इसके बूते पार्टी को आधिकारिक विपक्ष का दर्जा मिला। फिर 1967 में जनसंघ को 35 और 1971 में 22 सीटें मिली।

 

जनसंघ भारतीय राजनीति में जगह बना रहा था। इसके साथ ही देश में अन्‍य ताकतें भी राजनीति रूप से कांग्रेस की सत्‍ता के खिलाफ उभर रही थीं। तभी 1975 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर दिया। 1976 में आपातकाल के बाद जनसंघ का विलय भी जनता पार्टी में हो गया। कांग्रेस के खिलाफ भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इसका गठन किया था।

जनता पार्टी इंदिरा गांधी के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस को हराकर सत्‍ता में आ गई। इसमें जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री, लाल कृष्‍ण आडवाणी को सूचना एवं प्रसारण मंत्री और बृजलाल वर्मा को उद्योग मंत्री बनाया गया।

1980 में जनता पार्टी टूट गई। विभिन्‍न विचारधारा के लोगों से बना यह दल ज्‍यादा टिकाउ साबित नहीं हुआ। लिहाजा जनसंघ के नेताओं ने नई पार्टी बनाने का फैसला किया। हालांकि पार्टी का एक गुट इसके पक्ष में नहीं था। जबकि अटल बिहारी बापेयी और लालकृष्‍ण आडवाणी नए दल के पक्ष वाले गुट का नेतृत्‍व कर रहे थे।  6 अप्रैल 1980 को इस फैसले को अंजाम दिया गया और नये दल गठित कर इसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नाम दिया गया। जिसमें समाजवादी और गांधीवादी विचारधारा के नेताओं को भी शामिल किया गया।

दूसरी ओर जनसंघ के संस्‍थापक सदस्‍यों में से बलराज मधोक भाजपा के पक्ष में नहीं थे। उन्‍होंने जनसंघ की कमान संभाली और चुनाव आयोग से इसका पंजीकरण करवाकर राजनीतिक दल को बनाए रखा। साल 2016 तक मधोक इसके अध्‍यक्ष बने रहे। लेकिन भाजपा के उभार के साथ जनसंघ हाशिये पर चला गया।

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