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टिहरी की महारानी जो बनी देश की पहली निर्दलीय सांसद

20 मार्च 1903 को जन्मी थीं उत्‍तराखंड की पहली पद्मभूषण और देश की पहली निर्दलीय सांसद कमलेंदुमति शाह

PEN POINT DEHRADUN : आजादी के बाद 1951-52 के पहले लोकसभा चुनाव में दो ही महिलाएं निर्दलीय जीत कर संसद में पहुंची थी। उनमें से एक थीं टिहरी राजपरिवार की रानी कमलेंदुमति शाह। जिन्‍होंने सार्वजनिक जीवन में उतरते ही समाज सेवा के क्षेत्र में बड़ी इबारत लिखी। यही वजह है कि भारत सरकार ने उन्‍हें तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्‍मान पद्म भूषण से सम्‍मानित किया।

टिहरी राजपरिवार का भारतीय संघ में विलय 1949 में हो गया था। इसके तुरंत बाद राजा नरेंद्र शाह की मृत्‍यु हो गई। ऐसे में राजा के उत्‍त्‍राधिकारी मानवेंद्र शाह को चुनाव लड़ना था किंतु किसी वजह से उनका नामांकन रद्द हो गया। अब नरेंद्र शाह की पत्‍नी यानी राजमाता कमलेंदुमति शाह को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरना पड़ा। गढ़वाल बिजनौर लोकसभा सीट से अपने प्रतिद्वंदी कांग्रेस के कृष्‍णा सिंह को हराकर वे लोकसभा पहुंची। इस तरह भारत के इतिहास में कोचीन की ऐनी मस्‍करीन के साथ वे पहली निर्दलीय सांसद बनी।

संसद में उन्‍होंने अपने निजी विधेयक एवं बाल संस्थाएं (लाइसेंसिंग) बिल -1954 पर लोकसभा में चर्चा करवाई थी।

सांसद बनने के साथ ही वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो गईं। उन्‍होंने पहाड़ की महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं के लिए उल्‍लेखनीय कार्य किये। महाराजा नरेंद्रशाह ट्रस्‍ट की स्‍थापना कर उन्‍होंने राज्‍य के अनाथ, बेसहारा व विधवा महिलाओं की शिक्षा के लिए स्‍कूल खोला। अन्धे और वृद्धों के लिए अंध और वृद्ध विद्यालय की स्थापना की। बालिकाओं के लिए माध्यमिक विद्यालय व महाविद्यालय खुलवाए। समाज सेवा में किये गए उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए भारत सरकार ने उन्‍हें 1958 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। उत्‍तराखंड अलग राज्‍य बनने के बाद कहा जा सकता है कि  राज्‍य में पद्मभूषण प्राप्त करने वाली पहली शख्‍सियत कमलेंदुमति शाह हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार शीशपाल गुसांई बताते हैं कि कमलेंदुमति शाह टिहरी राजपरिवार के उन लोगों में से जिन्‍होंने समाज सेवा को तरजीह दी। उन्‍हें अपने क्षेत्र से विशेष लगाव और उनकी समस्‍याओं को लेकर चिंता रही। 20 मार्च 1903 को हिमांचल के क्‍योंथल राजघराने में जन्‍मी कमलेंदुमति का विवाह 13 वर्ष की आयु में ही टिहरी के राजा नरेंद्र शाह से हो गया था। कमलेंदुमति को हिंदी अंग्रेजी और फ्रेंच भाषाओं का अच्‍छा ज्ञान था। लेकिन वे गढ़वाली लोगों के साथ गढवाली में ही बातचीत करती थीं। अगर कोई गढ्वाली होते हुए उनसे हिंदी में बात करता था तो वे नाराज हो जाती थीं।

 

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