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एनडी तिवारी: दो दो राज्यों का मुख्यमंत्री बनने वाला देश का इकलौता नेता

– आज एनडी तिवारी की जयंती, 1991 में चुनाव हारने पर गंवाया प्रधानमंत्री बनने का मौका, 26 साल की उम्र में बन गए थे विधायक उत्तर प्रदेश में सबसे लंबे समय तक रहे मुख्यमंत्री
PEN POINT, DEHRADUN : उत्तराखंड की राजनीति में शायद ही कोई नारायण दत्त तिवारी के नाम से न वाकिफ हो। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इन 23 सालों में वह पहले मुख्यमंत्री हुए जिन्हें अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका मिला। लेकिन, यह रेकार्ड उनके अन्य रेकार्ड के सामने कहीं नहीं टिकता। पांच दशक लंबे राजनीतिक करियर में वह एक बार प्रधानमंत्री पद को ठुकरा चुके थे तो दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने से सिर्फ इसलिए चूक गए क्योंकि कांग्रेस लहर के बावजूद भी वह चुनाव नहीं जीत सके। देश का एक इकलौता ऐसा नेता जिसके हिस्से दो-दो राज्यों का मुख्यमंत्री बनने का रेकार्ड कायम है। विवाद और उपलब्धियों के साथ राजनीति में सफल पांच दशक लंबी पारियां खेलने वाले नारायण तिवारी का जन्म 18 अक्टूबर 1925 को हुआ तो उन्होंने आखिरी सांस भी 18 अक्टूबर को ही साल 2018 में आखिरी सांस ली।

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अंग्रेजी शासन के दौरान वन विभाग में अफसर पूर्णानंद तिवारी जिन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर आजादी के आंदोलन में खुद को शामिल कर दिया, उनके घर 18 अक्टूबर 1925 को नारायण दत्त तिवारी का जन्म हुआ था। पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए नारायण दत्त तिवारी भी छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बन गए। साल 1942 में आजादी की लड़ाई में जेल भी गए। देश की आजादी के बाद 1952 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हुए विधानसभा चुनाव में नैनीताल विधानसभा से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विधायक चुने गए। विधायक चुने जाने के वक्त उनकी उम्र केवल 26 साल थी, लिहाजा उत्तर प्रदेश विधानसभा में सबसे कम का विधायक चुने जाने का रेकार्ड भी उनके नाम रहा। 1957 में फिर से विधायक चुने गए और इस बार वह सदन में विपक्ष के नेता चुने गए। इस लिहाज से उनके नाम फिर सबसे युवा विपक्ष के नेता चुने जाने का रेकार्ड भी जा हो गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा से शुरू हुआ उनका यह राजनीतिक करियर अगले पांच दशकों तक चला। नारायण दत्त तिवारी 1976-77, 1984-84 और 1988-89 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और साल 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के तीसरे मुख्यमंत्री रहे। इससे पहले साल 1986-87 में एनडी तिवारी राजीव गांधी की सरकार में विदेश मंत्री रहे थे। इसके अलावा उन्होंने केंद्र में कई और मंत्रालय भी संभाले।

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राजनीति में वह कई नामों से भी विख्यात रहे। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रीकाल में जब संजय गांधी अपरोक्ष रूप से देश चला रहे थे तो नारायण दत्त तिवारी संजय गांधी के उन खास लोगों में शामिल थे जो संजय गांधी के हुक्म बिना सोचे समझे बजाने के लिए बदनाम थे। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को संजय गांधी के कहने पर इंदिरा गांधी ने पद से बर्खास्त कर दिया था तो मुख्यमंत्री की कमान नारायण दत्त तिवारी को सौंपी गई। वह उस दौरान लगातार अपनी कैबिनेट की दिल्ली संजय दरबार में परेड करवाते रहते। लिहाजा, राजनीति में एनडी तिवारी का उस दौरान नाम नई दिल्ली तिवारी बुलाया जाने लगा। बाद के सालों में पार्टी के लोग उन्हें एनडी यानि नथिंग डुइंग तिवारी कहकर संबोधित करते, विपक्षी ‘न नर न नारी’ कह कर बुलाते लेकिन चेहरे पर मुस्कान लिए नारायण दत्त तिवारी इन कटाक्षों को अनसुना कर आगे बढ़ते रहे। ,

प्रधानमंत्री की कुर्सी एक बार खुद ठुकराई, अगली बार हाथ नहीं आई
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। नारायण दत्त तिवारी उनकी कैबिनेट में विदेश मंत्री बनाए गए। सितंबर 1987 में एक बार ऐसा मौका आया जब नारायण दत्त तिवारी को प्रधानमंत्री की कुर्सी ऑफर की गई। जब राजीव गांधी बोफोर्स मामले में फंस चुके थे और विपक्ष सदन में हावी हो चुका था तो लोगों में भी काफी गुस्सा था। इस मामले में विश्वनाथ प्रताप सिंह रक्षामंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे तो अब प्रधानमंत्री राजीव गांधी की साख बचाने के लिए भी कांग्रेस योजनाएं बनाने लगी थी। पार्टी ने फैसला लिया था कि राजीव गांधी प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर किसी ओर को यह पद सौंप दे और माहौल के शांत होने का इंतजार करने के बाद वापिस पद पर आ जाएं। लिहाजा, नए प्रधानमंत्री चुनने के लिए दो विकल्प दिए गए पहले थे नरसिम्हा राव और दूसरे थे नारायण दत्त तिवारी। लेकिन, हिंदी बेल्ट बोफोर्स मामले में ज्यादा उग्र थी लिहाजा यह फैसला लिया गया कि उत्तर भारत के नेता को ही प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी जाए लिहाजा नारायण दत्त तिवारी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया। लेकिन, प्रधानमंत्री की कुर्सी तिवारी खुद ठुकरा दी। उन्होंने राजीव गांधी को सलाह दी कि राजीव प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं तो लोगों को लगेगा कि राजीव गांधी संकट से भागने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें इस त्याग का इनाम भी मिला, उन्हें अगले साल ही उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया। वहीं, दूसरी बार 1991 में जब चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की बम धमाके में हत्या कर दी गई थी तो कांग्रेस की वापसी की उम्मीद भी प्रबल हो चुकी थी। राजीव गांधी की हत्या के बाद नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल थे, तब पार्टी अध्यक्ष बनने के मायने थे कि चुनाव परिणाम के बाद प्रधानमंत्री बन जाना। हालांकि, सोनिया गांधी की मूक स्वीकृति पीवी नरसिम्हा राव के पक्ष में दी जा चुकी थी। लेकिन, एनडी तिवारी ने अपने पक्ष में भी कांग्रेस के बड़े नेताओं को लामबंद कर दिया था। वह जोर लगा चुके थे कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद वह प्रधानमंत्री बनेंगे क्योंकि ज्यादातर नेता राजीव गांधी के निधन के बाद या तो मैदान छोड़ चुके थे या फिर मुख्य चेहरा बनने की फिराक में नहीं थे। तिवारी ने 1991 का चुनाव नैनीताल संसदीय सीट से लड़ा लेकिन उनके सामने भाजपा ने बेहद युवा चेहरा बलराज पासी को खड़ा कर दिया। प्रधानमंत्री बनने की गरज से चुनाव लड़ रहे एनडी तिवारी उस वक्त सन्न रह गए जब परिणाम घोषित हुए और वह युवा बलराज पासी से 11 हजार वोटों से हार चुके थे। उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट चुका था।

 

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महिलाओं को लेकर था सॉफ्ट कार्नर, 89 की उम्र में रचाई शादी
महिलाओं के साथ उनके संबंधों को लेकर एनडी तिवारी की काफी किरकिरी होती रही। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के दौरान एक तेलुगू चैनल ने राजभवन के बिस्तर पर तीन महिलाओं के साथ उनका वीडियो दिखाया। इसकी वजह से तिवारी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। औरतों को लेकर इनकी कमजोरी बहुत पुरानी था। साल 2008 में रोहित शेखर ने एक अदालत में ये दावा करते हुए पैटरनिटी सूट दायर किया कि नारायण दत्त तिवारी उनके पिता है। डीएनए जाँच के बाद अदालत ने पाया कि नारायण दत्त तिवारी रोहित शेखर के बॉयलॉजिकल पिता हैं। 89 की उम्र में शादी वर्ष 2014 में नारायण दत्त तिवारी ने रोहित शेखर की माँ उज्जवला तिवारी से शादी कर ली।

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