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पुण्‍यतिथि : और आसमान में ही रह गई करनाल की कल्‍पना

अंतरिक्ष को छूने वाले पहली भारतीय महिला कल्‍पना चावला की आज है पुण्‍यतिथि, महान अंतरिक्ष यात्री के रूप में की जाती हैं याद  

PEN POINT, DEHRADUN : साल 2003 में पहली फरवरी को पूरी दुनिया एक दर्दनाक घटना की गवाह बनी। इस दिन नासा का अंतरिक्ष यान कोलंबिया धरती पर वापसी कर रहा था। अचानक अमेरिका में नासा से निकली चिंता की लहर देखते ही देखते चारों ओर फैल गई। टीवी स्‍क्रीन पर कोलंबिया अंतरिक्ष यान पर आग की लपटों की ब्रेकिंग न्‍यूज चलने लगी। कुछ ही देर में सभी की निगाहें इस घटना पर टिक गई। अंतरिक्ष यान में आग लगने और उसके टूट कर बिखरने के फुटेज भी नासा के जरिए टीवी स्‍क्रीन तक पहुंचने लगे। लोग टकटकी लगाए इसे देख रहे थे और इस घटना से जुड़ी हर खबर को जानना चाहते थे। भारत में भी ऐसे ही हालात थे। दरअसल, इस अंतरिक्ष यान में भारत की ऐस्‍ट्रोनॉट कल्‍पना चावला भी शामिल थी। हरियाणा के करनाल में जन्‍मी कल्‍पना की यह दूसरी अंतरिक्ष यात्रा थी और वह अपनी पहली यात्रा में अंतरिक्ष को छूने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी थी। कुछ ही घंटों में खबर आई कि यान पूरी तरह जल कर बिखर चुका है और उसमें सवार एक भी अंतरिक्ष यात्री जिंदा नहीं बचा। इस तरह करनाल की कल्‍पना आसमान में ही रह गई।

दरअसल अंतरिक्ष से वापसी के समय यह अभियान सफल बताया जा रहा था। लेकिन इस भीषण दुर्घटना के साथ अभियान की सच्‍चाई पूरी दुनिया ने देखी। यह अभियान साल 2000 में ही होना था, लेकिन कई तकनीकी वजहों से यह काम लगातार पीछे खिसकता रहा। दुर्घटना के बाद ही इस अभियान से जुड़ी कई बातें विभिन्‍न मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई। मसलन, अभियान में देरी की वजहों में से एक इसके शटल इंजन के बहाव स्‍तरों में दरारें उभरना था। इसके अलावा शटल इंजन को तैयार करने की प्रक्रिया भी काफी पेचीदा रही। आखिरकार 16 जनवरी 2003 को कोलंबिया यान के साथ एसटीएस 107 मिशन शुरू हुआ। जिसमें कल्‍पना चावला के अलावा कमांडर रिक डी हुसबंद, पायलट विलियम एस मैकूल सहित कमांडर माइकल एंडरसन, इलान रामो डेविड ब्राउन व लॉरेल बी क्‍लार्क शामिल थे। सात लोगों की इस टीम की जिम्‍मेदारी स्‍पेस हैब, फ्री स्‍टार लघु गुरुत्‍व, बल्‍ले बल्‍ले जैसे तकनीकी कार्य थे। जिसके लिए टीम ने अंतरिक्षक में अस्‍सी प्रयोग किये। जिनके जरिए पृथ्‍वी व अंतरिक्ष विज्ञान, तकनीकी विकास व अंतरिक्ष यात्रा में स्‍वास्‍थ्‍य व सुरक्षा का अध्‍ययन किया गया। लेकिन एक फरवरी 2003 में अंतरिक्ष से वापसी करता हुआ यह यान जब पृथ्‍वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही यह दुर्घटनाग्रस्‍त हो गया। देखते ही देखते इसके टुकड़े अमेरिका के टेक्‍सास शहर के पास गिरने लगे। इस तरह सभी यात्री आसमान में ही विलीन हो गए। इसके साथ ही अपने करियर के दौरान कल्‍पना के कहे गए ये शब्‍द भी सत्‍य साबित हुए- ” मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ। प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी।“

हवाई जहाज चलाने के साथ बनी वैज्ञानिक

कल्‍पना चावला का जन्‍म हरियाणा के करनाल में हुआ था। पिता बनारसी लाल चावला उन्‍हें डॉक्‍टर या टीचर बनाना चाहते थे। लेकिन मां संजयोती देवी चार भाई बहनो में सबसे छोटी मोंटू यानी कल्‍पना की इंजीनियरिंग में दिलचस्‍पी देखते हुए उसे आगे बढ़ने में मदद की। स्‍वभाव से जुझारू और लगनशील कल्‍पना की शुरुआती पढ़ाई टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से हुई। उसके बाद पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज चंडीगढ़ से उन्‍होंने एयरो इंजीनियरिग में दाखिला लिया और 1982 में पास आउट हुई। अपनी रुचि के चलते 1982 में ही कल्‍पना अमेरिका चली गईं और 1984  में एयरो इंजीनियरिंग में ही टैक्‍सास यूनिवर्सिटी से उच्‍च डिग्री हासिल की। 1988 में कोलाराडो यूनिवर्सिटी से इसी विषय में एडवांस डिग्री ली और हवाई जहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के लाइसेंसों के उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल भी किया। वह सिंगल और डबल इंजन हैलीकॉप्‍टर उड़ाने में भी माहिर हो गई।

अंतरिक्ष जाने वाली पहली भारतीय महिला

शिक्षा और विमान प्रशिक्षण के साथ ही कल्‍पना नासा में प्रसिद्ध वैज्ञानिक भी बन चुकी थी। मार्च 1995 में उन्‍हें नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल किया गया। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन 19 नवम्बर 1997 को छह अंतरिक्ष यात्री दल के साथ शुरू हुआ। यह अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-87 थी। इसके साथ ही वह कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं और राकेश शर्मा के बाद भारतीय मूल के दूसरे व्‍यक्ति के रूप में अंतरिक्ष में पहुंची।

 

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