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देश के कई राज्यों में लागू है स्थानीय निवासियों को नौकरियों में आरक्षण का कानून

– उत्तराखंड में मूल निवासियों को नौकरियों में आरक्षण दिए जाने की मांग स्थानीय लोग कर रहे हैं, जबकि देश कई राज्यों ने स्थानीय निवासियों के लिए निजी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू की है
PEN POINT, DEHRADUN : उत्तराखंड में मूल निवास कानून लागू करने को रविवार को प्रदेश भर से बड़ी संख्या में लोगों ने देहरादून में पहुंचकर महारैली में हिस्सा लिया। उत्तराखंड में लंबे समय से मांग की जा रही है कि नौकरियों में स्थाई निवास प्रमाण पत्र व्यवस्था खत्म कर मूल निवास व्यवस्था को शुरू किया जाए। तर्क दिया जा रहा है कि स्थाई निवास प्रमाण पत्र बनाने के नियमों में लचीलापन होने से बाहरी मूल के लोग राज्य में स्थाई निवास प्रमाण पत्र बनाकर सरकारी नौकरियां पा रहे हैं। ऐसे में लगातार मांग की जा रही है कि राज्य में मूल निवास कानून को 26 जनवरी 1950 से लागू कर सरकारी नौकरियों में मूल निवास प्रमाण व्यवस्था शुरू की जाए। हालांकि, देश में उत्तराखंड पहला राज्य नहीं है जहां इस तरह की मांग उठ रही है। देश के अलग अलग राज्यों में मूल निवासी लगातार सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में मूल निवासियों को प्राथमिकता और आरक्षण देने की मांग करते रहे हैं। तो कई राज्यों ने अपने राज्य के मूल निवासियों के लिए सरकारी और गैर सरकारी निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की है।
राज्य में मूल निवासियों को सरकारी और निजी नौकरियों में आरक्षण देने, प्राथमिकता देने की मांग देश में नई नहीं है। अलग अलग राज्यों ने समय समय पर अपने राज्य के मूल निवासियों को सरकारी और निजी नौकरियों में वरीयता देने के लिए मूल निवासियों को भारी आरक्षण भी दिया है। राज्य सरकार की ओर से मूल निवासियों को आरक्षण देने के फैसले को न्यायालयों में चुनौती न मिल सके इसके लिए राज्य सरकारों की कोशिश रहती है स्थानीय आरक्षण के कानून को संविधान की नौवीं अनुसूचि में शामिल किया जाए। हालांकि, राज्य अगर स्थानीय आरक्षण की व्यवस्था करता है तो इसके लिए केंद्र की अनुमति की जरूरत होती है। ज्यादातर मामलों में केंद्र सरकार ने किसी भी राज्य के प्रस्ताव को खारिज करने के फैसला अब तक लिया नहीं है।
किसी भी राज्य में नौकरी को लेकर प्रतिबंध नहीं
भारत का संविधान देश के व्यक्ति को देश के किसी भी हिस्से में नौकरी करने का अधिकार देता है। संविधान के भाग 3 में मूल अधिकारों में पहला मूल अधिकार समता का अधिकार है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद -14 में यह व्यवस्था की गई है कि देश के किसी भी राज्य में किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद-16 (1) के अनुसार, राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। अनुच्छेद 13(2) में कहा गया है कि राज्य इस प्रकार की कोई विधि नहीं बनाएगा, जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती हैं या कम करती हैं। संविधान के तहत किसी भी राज्य के निवासी को दूसरे राज्य में रोजगार के लिए जाने को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके बावजूद अलग- अलग राज्यों में रोजगार के लिए मूल निवासियों के लिए राज्य अपने स्तर पर प्रावधान कर रहे हैं।
संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को मूल अधिकारों के तहत समता के अधिकार के तहत देश के किसी भी हिस्से में नौकरी पाने के अधिकार के बावजूद हाल के सालों में राज्यों ने स्थानीय आरक्षण की व्यवस्था कर बाहरी राज्यों के लोगों के लिए अपने राज्यों में नौकरियां पाने के अवसर कम किए हैं। साल 2019 में आंध्र प्रदेश पहला ऐसा राज्य था, जहां निजी नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिया गया था। आंध्र प्रदेश विधानसभा की ओर से पारित इस कानून के अनुसार राज्य में स्थित औद्योगिक इकाइयों, समेत विभिन्न तरह की परियोजनाओं में 75 फीसदी नौकरियां स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित रहेंगी। यदि कंपनियों को आरक्षित पदों के अनुसार योग्य कामगार नहीं मिलते हैं तो इस कानून के तहत कंपनियों की जिम्मेदारी बनती है कि वह राज्य सरकार के साथ मिलकर कौशलता विकास प्रशिक्षण चलाकर स्थानीय युवाओं को नौकरी के योग्य कुशल बनाए। हरियाणा सरकार ने भी मार्च 2021 में निजी क्षेत्र में आरक्षण की घोषणा की थी। नवंबर 2021 में हरियाणा सरकार ने प्राइवेट नौकरियों में 75 फीसदी आरक्षण वाले कानून की अधिसूचना जारी की थी। 15 जनवरी 2022 से यह कानून पूरे राज्य में लागू हो गया था। इसके तहत 30 हजार रुपये तक की सैलरी वाली निजी नौकरियों में प्रदेश के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के रोक को हटा दिया था। इसके अलावा झारखंड में भी स्थानीय नौकरियों में स्थानीय लोगों को 77 फीसदी आरक्षण का कानून पिछले साल लागू किया गया जो स्थानीय निवासियों को दिए जाने वाले आरक्षण में सबसे ज्यादा है। तमिलनाडु में निजी नौकरियों में स्थानीय निवासियों को 69 फीसदी आरक्षण देने का कानून लागू है।

 

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